Friday, 4 December 2009

रूपांतरण

पेड़ टिका रहता है जमीन पर,
जड़ें डाले,
प्यारी,उपजाऊ जमीन,
मेरे ढेर सारे बीजों को खिलाएगी मेरे अगल बगल।

जंगल हर पेड़ का सपना होता है।

एक बीज गिरता है गुलाबों के बाग़ में ,
और जिंदगी अभिशाप हो जाती है उसकी,
कोसता है अपने गुलाब न होने को,

गुलाब लहकते हैं, दहकते हैं,
चमकते कांटे, झूमती टहनियां,
और यह पौधा
अकेला
इन्तजार करता है अपने काँटों के निकलने का

ऊपर बढ़ते हुए, देखता है मन मसोसे ,
पीछे छूटते गुलाबों को,
छूटता रिश्ता, छूटती आशा, टूटे सपने,
विवश, कोसता है जिसने उसे लगातार बढ़ने का
श्राप दे दिया ।

और धीरे धीरे, ऊंची नजर देखती है,
थोड़ी दूर, भीर से उठे दूसरे पेड़ को,
थोड़ा भौंचक, थोड़ा चकित,
रुआंसा और फ़िर मुदित,
आह्लादित,
हवाओं में उड़ा देता है जन्म भर की ग्लानी को
रूपांतरण,
गुलाब के पौधे से आम के पेड़ में ।

1 comment:

shalini said...

Simulating the real life of the present generation.