जब हमने अपना टीवी चैनल खोलने का विचार किया, तो सबसे पहले प्रोग्राम मेनेजर की कुरसी के लिए इश्तहार दिया। कई आवेदन पत्रों को छांटने के बाद श्री योगेन्द्र भंसाली को बुलाया इंटरव्यू के लिए।
मैं: प्रोग्राम मेनेजर बनने के लिए सबसे जरूरी कौन सा गुण है?
यो: यह समझना कि एक प्रोग्राम बनाना मछली पकड़ने की तैयारी से काफ़ी मिलता जुलता है
मैं: जरा विस्तार से बताने का कष्ट करेंगे?
यो: अजी काफ़ी सिंपल है। दर्शक आपके लिए मछली हैं, जो टीवी के सागर में हर दिन चैनलों के गिर्द तैरते रहते हैं। हर प्रोग्राम उन्हें पकड़ने का काँटा है। मछली फंस गई, इसका पता आपको टी आर पी (तड़प) रेटिंग से पता चलता है। काँटा डालने का काम तो आपका क्रिएटिव मेनेजर करता है, पर उसके बाद मछली को दिनों,हफ्तों,महीनो तक लटकाए रखने का काम प्रोग्राम मेनेजर का होता है।
मैं: हम्म , मुझे पहले से ही ऐसा लगता था। आपकी इस पूरे प्रकरण में किस विधा में योग्यता हासिल है?
यो: वैसे तो मैं अपनी बघारने में ज्यादा विश्वास नहीं रखता हूँ, पर वोह सीरियल याद है, 'कुछ तो हुआ है' ?
मैं: हाँ, वही सीरियल न, जिसमे शुरुआत मर्डर मिस्त्री से हुई थी ? पहले लोग काफ़ी देखते थे, पर तीन चार साल देखते रहने के बाद लोग जब सीरियल का नाम बदलने के बारे में सोचने लगे तभी जाकर कुछ हुआ। तब लोगों ने कहा 'कुछ हुआ तो है!'
यो: जी हाँ। अब आप यह बताइए के यह सीरियल कितने एपिसोड का था?
मैं: शायद हजार?
यो: आपको पता नहीं, पर पहले स्क्रिप्ट सिर्फ़ तेरह कड़ियों कि बनी थी । जब दर्शकों को जासूस जोड़ी पसंद आ गई और मर्डर से परदा उठने वाला था, तब मेरी बुलाहट हुई। प्रोड्यूसर सर पकड़ कर बैठा था। क्रिएटिव डिरेक्टर हाथ उठाकर बैठा था कि कहानी अच्छे मोड़ पर ख़तम कर अगले प्रोग्राम पर लगेगा। पर फंसी मछली को छोड़ना इतना आसान थोड़े ही है? अब आप सोचो, एक एपिसोड , गुनाहगार का डीएनए तक मैच हो चुका है। हीरो हिरोइन एक दूसरे को बधाई दे चुके हैं, और लास्ट एपिसोड में बस दोनों की शादी और गुनाहगार को सजा होनी है। यहाँ से कहानी उठाकर और हजार एपिसोड तक बढ़ाने का काम मैंने किया था।
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