Sunday, 16 November 2008

छठ और सूर्य

आज हम तुम्हे पूजा कर रहे हैं, शाम का प्रणाम और सुबह की पूजा, उपवास और गीत। ठण्ड में एक दीपक की लौ पर ध्यान रख घाट में उतरी महिलायें, और भीड़ भरे घाट। इनमे से शायद ही कोई सोचता है तुम्हारे बारे में। अगर धरती हमारी माता है तो पिता तो तुम हो, फिर क्योँ यह उदासीनता ? शायद जो रवैया हम अपने पिता को जानने में रखते हैं, शायद वही यहाँ भी लागू होता है। नही तो ऐसा क्यों कि सारे ग्रन्थ और पुराण बड़े बड़े देवताओं की बात तो करते हैं, पर तुम्हारी कहानी शायद ही कहीं विस्तार से आती है। सात घोडों के रथ, अरुण और गरुड़ , हनुमान की बाल लीला और ऐसे ही चंद टुकड़े। बस यही परिचय है तुम्हारा, हमारे पिता का ?
मैं शुरूआत करता हूँ कुछ कठिन सवालों से। देखता हूँ उस रौशनी की नदी , आकाश गंगा को, और पूछता हूँ, क्यो यह रौशनी, महानगरीय चमक दमक तुम्हे खींच नही पायी? या, अपने अच्छे दिन वहां रौशनी में बिता, बाद में परिवार के साथ इतनी दूर अलग थलग आ गए ताकि बच्चे उस रौशनी से बचे रहें, सुरक्षित ? या फ़िर तुम कोई छोटे सितारे तो नही जो उस महानद के बड़े बुल्ली सितारों से कन्नी काट चुप चाप अपनी सीधी शांत जिंदगी बिताने इधर कोने में आ पड़े?
तुम शांत मुस्कुरा रहे हो, या ये मेरी खिल्ली उडाने वाली मुस्कान है? कहीं ऐसा तो नहीं की तुम वैसे अंग्रेजों की तरह हो, जो लन्दन की बहु नगरीय संस्कृति को छोड़, अपनी शाही कोठी में, गाँव में बैठे हो अपने परिवार के साथ, अपने गुरुत्व का अभिमान लेकर?
जवाब दो, तुम कौन हो ? ऐसे चुप मत बैठना जैसे एक वैज्ञानिक अपने सात साल के पुत्र की बात के जवाब में ' तुम नहीं समझोगे क्वांटम फिजिक्स ' वाली चुप मुस्कराहट फेंकता है! मैं जिद्दी बच्चा हूँ, क्या पता तुम्हारे अतीत को खोदना ही अपना लक्ष्य बना बैठूं? फ़िर बाद में यह मत कहना कि पूरी जिंदगी क्यों बरबाद की।

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